बकरी की बीमारियाँ एवं उपचार। Goat Disease & Treatment in Hindi.

Goat Disease यानिकी बकरी की बीमारीयों पर वार्तलाप करने से पहले यह समझ लेना बेहद जरुरी है की बकरी पालन व्यवसाय बेहद कम निवेश के साथ शुरू तो किया जा सकता है । लेकिन खासकर बरसात में बकरियों की बहुत सारी संक्रामक बीमारियाँ शुरू हो जाती हैं जिसके चलते किसानों की बकरियाँ मर सकती हैं। इस डर से छोटे किसान बकरी पालन करने से भी डरते हैं। इसलिए आज हम इस लेख के माध्यम से यहाँ बकरियों के कुछ प्रमुख रोग अर्थात Goat Disease के बारे में वार्तालाप करेंगे। ताकि बकरी पालन करने वाले उद्यमी बकरी की बीमारीयों के बारे में जानकर अपनी बकरियों को इन बीमारीयों से बचाने की कोशिश करते रहें और उनका यह Business Plan सफलतापूर्वक आगे की ओर बढ़ता रहे।

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Table of Contents

1. चेचक या गोटपॉक्स (Goat Pox Goat Disease )

यह विषाणु (वायरस) जनित भयंकर संक्रामक तथा छूत की बीमारी है । श्वसन प्रक्रिया, त्वचा के घाव के माध्यम से विषाणु स्वस्थ बकरियों के देह में प्रवेश करता है । एवं 2-7 दिनों के अंदर रोग के लक्षण उभरते है ।

चेचक के लक्षणः

इस Goat Disease  अर्थात रोग के प्रथम चरण में दैहिक तापमान बढ़ता  रहता है जो 106° फेरनहाइट तक हो सकता है, नाक और आंखों से पानी निकलता है।  होंठ, मुँह, थन, चूचुक पूंछ के नीचे तथा शरीर के अन्य हिस्सों पर घने छाले निकल आते है ।

चेचक में बकरी की देखभाल Caring in Goat pox Goat Disease):

पीड़ित पशु को अन्य स्वस्थ बकरियों से अलग रखना होगा । छालों तथा घावों को हाइड्रोजन परऑक्साइड और गुनगुने पानी से साफ करना होगा । पॉक्स वायरस (Pox virus) द्वारा संक्रामित होने पर बकरियां सुस्त हो जाती है । इस समय बकरियों अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए एन्टिबायोटिक दवांए जैसे ऑक्सीटेट्रासाइल्किन, एम्पीसिलिन, स्ट्रेप्टोपेनिसिलिन आदि दी जा सकती हैं । इस रोग से बकरियों को बचाने के लिए पहले ही टीका लगाना आवश्यक है ।

चेचक के टीके :

गोट पॉक्स टीका (IVRI) 0.3 मिलिलिटर प्रत्येक बकरी को कान के बाहरी हिस्से में (ऊपर से एक इन्च नीचे) त्वचा के नीचे इंजेक्शन लगाना होगा । इंजेक्शन लगाने वाले स्थान को साफ करने के लिए स्पीरिट या आयोडिन का प्रयोग नहीं करना चाहिए । टीका रक्तनलिका में प्रवेश न करें | 3 माह की आयु में पहली बार एवं बाद में वर्ष में एक बार यह टीका लगाना होगा ।

2. बकरी को निमोनिया (Pneumonia Goat Disease)

इस Goat Disease की उत्पति पानी में भीगने से, ठंड लग जाने से या अचानक मौसम के परिवर्तन से बकरियों को सर्दी-जुकाम के कारण हो सकता है । इस दौरान बकरियां कई प्रकार के रोग जीवाणु द्वारा आक्रान्त हो सकती है । रोग पुराना हो जाने पर छाती में कफ (cough) जमा हो जाता है, जिससे निमोनिया हो सकता है । बकरियां कमजोर हो जाती है, नाक से सर्दी बहती है, खाने में अरूचि, कब्ज की शिकायत रहती है एवं पशु जुगाली करना बंद कर देता है । दैहिक तापमान बढ़कर (104° -107° फेरनहाइट) हो जाता है व बकरी सुस्त हो जाती है । माइकोप्लासमा माइकोयडिस वर कैप्री (Mycoplasma mtv/coides par capri) नामक जीवाणु द्वारा आक्रान्त होने पर इस रोग को बकरियों के संक्रामक प्लूरो-निमोनिया (Contagious Caprine Pleuro Pneumonia) या संक्षेप में CCPP कहते हैं । यह Goat Disease एक भयंकर बीमारी है । इस रोग से एक साथ कई बकरियां पीडित होती हैं एवं इनकी मृत्यु हो जाती है ।

निमोनिया न हो इसके लिए क्या करें:

 साफ सुथरे तरीके से बकरी पालन करने पर इस रोग से बचा जा सकता है । बकरियों को ठंड लगने से बचाना होगा तथा उनका आवास सूखा रखना होगा । सामान्य सर्दी जुकाम या निमोनिया में जीवाणु का आक्रमण होता है, इसलिए एंटीबायोटिक जैसी दवाओं से फायदा होता है । जैसे ऑक्सीटेट्रासाईल्विन, एम्पीसिलिन व क्लोकसासिलिन आदि । दैहिक तापमान अत्याधिक बढ़ जाने पर ज्वर कम करने की दवा देनी होगी । जैसे-पैरासिटामल, नोवलजिन-वेट, वैलविनेट-वेट, वोलिन आदि । बकरियों को संक्रामक प्लूरो निमोनिया या CCPP होने पर एंटीबायोटिक जैसी दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है । इस रोग के रोकथाम के लिए पहले से टीका लगाना होगा ।

बकरियों को निमोनिया का टीका:

इस Goat Disease से बचने के लिए सी.सी.पी.पी वैक्सीन (CCPP vaccine, IVRI) 02 मिलिलिटर प्रत्येक बकरी के कान के ऊपरी हिस्से में त्वचा के नीचे वर्ष में दो बार इंजेक्शन लगाना होगा ।

3. ऊतकक्षयी आंत्रशोध (Enterotoxaemia Goat Disease)

क्लॉसट्रीडियम परफ्रिन्जेन्स (Clostridicum perfringens) नामक जीवाणु द्वारा यह Goat Disease अर्थात  रोग होता है । संक्रमित पानी तथा भोजन के माध्यम से रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु स्वस्थ बकरी के शरीर में प्रवेश करके आंत में टॉक्सिन (toxin) या विष उत्पादन करके यह रोग उत्पन्न करते हैं ।

रोग के  लक्षणः

पेट में तेज दर्द व बकरी छटपटाती है । सांस लेने व छोड़ने में परेशानी होती है । पेट फुल जाता है । तरल मल, मांसपेशी में खींचाव व हल्का कंपन महसूस होता है । मेमनों में सहनशीलता कम होने के कारण अचानक उनकी मृत्यु हो जाती है ।

ऊतकक्षयी आंत्रशोध में क्या करें

चिकित्सा से कोई विशेष फायदा नहीं होता है । इस भयंकर रोग से बकरियों को बचाने के लिए वर्ष में दो बार टीका लगाने की जरूरत है । डेढ़ माह के बच्चों को टीका लगाया जाता है, 21 दिनों के बाद बूस्टर डोज एवं बाद में वर्ष में दो बार । एन्टेरोटॉक्सीमिया वैक्सीन टाइप-डी (Enterotoxaemia Vaccine type D, Intervet) 2.5 मिलि. प्रत्येक बकरी के त्वचा के नीचे इंजेक्शन दिया जाता है । एन्टेरोटॉक्सीमिया वैक्सीन (टाइप सी व डी) की मात्रा प्रत्येक बकरी के लिए 5 मिलि है ।

4. खुरपका-मुँहपका रोग (Foot and Mouth Goat Disease)

यह विषाणु जन्य भयंकर प्रकार की छूत की बीमारी अर्थात Goat Disease है । बकरी सहित सभी विभाजित खुरों वाले पशुओं को यह रोग हो सकता है । पीड़ित पशु के मुँह तथा पैर (खुर) में घाव इस रोग का प्रधान लक्षण होने के कारण इसे फूट एन्ड माउथ डिजिज या संक्षेप में एफ.एम.डी (FMD) कहते हैं ।

खुरपका मुहंपका रोग के लक्षण :

इस Goat Disease में प्रथमावस्था में पीड़ित पशु को तेज बुखार (104° -106° फेरनहाईट) होता है । जीभ पर फफोलें निकलते हैं । बाद में उनके फटने पर घाव बन जाता है, जीभ सूज जाता है तथा लाल हो जाता है, जीभ के छाले फटने पर बुखार कम हो जाता है जीभ पर घाव के कारण बकरी कुछ खा नहीं पाती है । खुरों के बीच घाव होने के कारण बकरी को चलने फिरने में परेशानी होती है, वह लंगड़ाकर चलती हैं । गर्भवती बकरी का गर्भपात हो सकता है ।  दुधारू बकरियों का दूध कम हो जाता है । बकरियों की प्रजनन क्षमता कम हो जाती है तथा गर्भधारण करने में विंलब होता है ।

खुरपका मुहँपका रोग में क्या करना चाहिए:

चूंकि यह रोग विषाणु जन्य है, अतः इसकी चिकित्सा नहीं है । लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित चिकित्सा की जा सकती है । 1 % फिटकिरी (alum) या पोटाशियम परमैंगानेट युक्त पानी (1 : 2000) से मुँह का घाव साफ करके बोरोग्लिसारिन मलहम (1 ग्राम बोरिक ऐसिड पावडर 60 मिलि ग्लिसरिन के साथ मिलाकर लगाने से तुंरत ठीक हो जाता है । पैर का घाव 2 % तूंत (Copper sulphate) के पानी से साफ करके जीवाणुनाशक मलहम, जैसे हिमाक्स (Himax) डर्मोंसेप्ट (Darmocept) या सोरिन (Sorin) लगाना होगा । पैर के घाव पर मक्खी बैठने से वह अंडा देगी या कीड़े (मक्खी का लार्वा) हो सकते हैं । ताकि मक्खी न बैठे इसलिए 1 भाग तारपिन तेल, 1 भाग यूकेल्पिटस तेल एवं 15-20 भाग तिल या नारियल का तेल एक साथ मिलाकर दिन में 2-3 बार इस Goat Disease में लगाना होगा । पैर के घाव में कीड़े हो जाने पर यह तेल लगाकर कीड़ा निकालना होगा । सिर्फ तारपिन तेल से भी यह कार्य किया जा सकता हैं । यह ध्यान रखना होगा कि इसके लिए फिनाईल का प्रयोग न किया जाए । जीवाणु के आक्रमण को रोकने तथा मुँह एवं पैर के घाव को जल्दी ठीक करने के लिए ब्रॉड स्पेकट्रम (broad spectrum) एन्टिबायोटिक  जैसी दवा का इंजेक्शन के रूप में प्रयोग करने से इस Goat Disease में फायदा होता है । जैसे आक्सीटेट्रसाईक्लिन, एम्पीसिलिन, स्ट्रेप्टोपेनिसिलिन आदि । बुखार अधिक होने पर उसे कम करने की दवा देनी होगी । नोवलजिन या बोलिन या वैल्जिनेट वेट 2-8 मिलि मांसपेशी में इंजेक्शन (शारीरिक वजन के अनुसार मात्रा ठीक करनी होगी । निर्धारित समयसूची के अनुसार प्रतिशोधक टीका के प्रयोग से इस रोग को रोक पाना संभव है । रक्षा – ओवैक (Raksha ovac, Indian Immunologicals) मात्रा : 1 मिलि मांसपेशी में इंजेक्शन 1 पहला टीका 4 महीने की उम्र में, तदुपरांत प्रत्येक 9 महीने के अंतर पर टीका देना होगा । यह 10 मिलि वॉयल में उपलब्ध है ।

5. पशुमाता (Rinderpest Goat Disease)

 यह Goat Disease अर्थात रोग गाय, भैंस, भेड़ आदि प्राणियों के जैसे बकरियों को भी हो सकता है । यह विषाणु जन्य छूत की बीमारी है ।

पशुमाता रोग के लक्षणः

इस Goat Disease से पीडित पशु को तेज बुखार (1050-107° फेरनहाईट) होता है । आंखें लाल हो जाती हैं तथा कांची निकलता है । होठों के अंदर, जीभ के नीचे, मूर्धा तथा जबड़ों में दाने निकल आते है । एवं घिसने पर घाव बन जाते हैं । प्रथमवस्था में कब्ज की शिकायत होती है, एवं 4-5 दिनों के अंदर पशु पानी के जैसे तरल मल त्याग करता है तथा बुखार कम हो जाता है । पीड़ित पशु खाना छोड़ देता है । रोग शुरू होने के 7-12 दिनों के अंदर पशु की मृत्यु हो जाती है ।

पशुमाता रोग में क्या करना चाहिए:

 सामान्यत: इस रोग की कोई विशेष चिकित्सा नहीं है । लक्षणानुसार चिकित्सा की जाती है । जीवाणु के आक्रमण को रोकने के लिए ब्रॉड स्पेकट्रम (broad spectrum) एन्टिबायोटिक इंजेक्शन लगाना होगा । तरल मल को बंद करने के लिए डेक्सट्रोज सैलाइन (Dextrose saline) इंजेक्शन देने की आवश्यकता है । हमारे देश में इस रोग का प्रकोप काफी कम है । तथापि, जिस क्षेत्र में बकरियों को यह रोग होता है, वहाँ इसके प्रतिशोधक टीके की जरूरत है । जी.टी.वी रिन्डरपेस्ट वैक्सीन (G.T.V. Rinderpest vaccine, IVRI/BAIF) 1 मिलि त्वचा के नीचे इंजेक्शन, एकबार यह टीका लगाने के बाद 4-5 वर्षों तक इस रोग की संभावना नहीं रहती है ।

6. पी.पी.आर. या गोट प्लेग (PPR or Goat plague)

इस Goat Disease को पेस्टी डेस पेटिटस रूमिनेन्टस (Peste des petits ruminants) या संक्षेप में पी.पी.आर. कहते हैं यह बकरियों की भंयकर छूत की बीमारी है । इसे बकरी का प्लेग भी कहते हैं । एक विशेष प्रकार का विषाणु बकरियों तथा भेड़ों में यह रोग फैलाता है । पशुमाता रोग सृष्ट करने वाले विषाणु तथा पी.पी.आर. विषाणु में कई समानताएं हैं । इन दोनों रोगों के लक्षणों में भी समानताएं हैं (तेज बुखार, अतिसार एवं सांस की तकलीफ) वर्ष 1989 में भारत में सर्वप्रथम भेड़ और बकरी के पीड़ित होने की सूचना मिलती है । वर्तमान भारत के सभी राज्यों में यह रोग होता है ।

पी.पी.आर रोग के लक्षण (Symptoms of PPR Goat Disease):

 यह Goat Disease भेड़ की अपेक्षा बकरियों को अधिक होता है । 4-12 महीनों की बकरियों को यह रोग अधिक होता है । किसी पशुशाला या क्षेत्र में लगभग 75-90% बकरियां इकट्ठे इस रोग से पीड़ित होती है, एवं इसमें मृत्युदर लगभग 50% से अधिक है, आंखों की कनजंक्टाइना, मुँह अथवा श्वसन तंत्र के माध्यम से इस रोग का विषाणू स्वस्थ बकरियों के शरीर में प्रवेश करता है एवं 4-7 दिनों के अंदर लक्षण नजर आते हैं । प्रथमावस्था में, बकरी को तेज बुखार (1059-107° फेरनहाईट) होता है, एवं खाने अरूचि, ऊंघना, आंख तथा कानों से पानी निकलता है, तदुपरांत आँखें लाल आँखों में कांची होता है । होंठों, जीभ, मूर्धा, जबड़ा व मुंह के कोने में घाव होता है । बुखार होने के 3-4 दिनों के बाद से बकरी पानी के जैसे तरल मल त्यागती है । बाद में खांसी व सांस लेने में तकलीफ होती है । इस Goat Disease में अतिसार शुरू होने के एक सप्ताह के अंदर पीड़ित पशु की मृत्यु हो जाती है ।

पी.पी.आर में क्या करना चाहिए:

इस रोग के इलाज से फायदा नहीं होता है । तथापि, रोग के दौरान बकरियों को जीवाणु के संक्रमण से बचाने के लिए ब्रॉड स्पेकट्रम एन्टिबायोटिक (जैसे स्ट्रप्टोपेनिसिलिन, जेन्टामाईसिन आदि) निर्धारित मात्रा में दी जाती है । इसके अलावा बुखार कम करने की दवा (जैसे बोलिन) एवं एन्टिहिस्टामिन (जैसे एविल या क्लोरिलवेट) प्रयोग करने से फायदा मिलता है । अत्याधिक अतिसार होने पर शरीर में पानी कम हो जाता है । तब इस Goat Disease में डेक्सट्रोज या नार्मल सेलाईन इंजेक्शन नस में  देना होगा । इस बीमारी में हाईपर इम्युन सिरम मिलने पर पीड़ित बकरी के नस में 5 मिलि इंजेक्शन देने पर वह स्वस्थ हो जाती है ।  इस रोग से बकरियों को बचाने के लिए पहले से ही पी.पी.आर. टीका देना होगा । वर्तमान (IVRI) के मुक्तेश्वर कैंपस एवं चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित पशुचिकित्सा तथा पशुपालन विश्वविद्यालय में पी.पी.आर. टीका तैयार किया जाता है । आने वाले दिनों में यह टीका दूसरे राज्यों में भी तैयार किया जाएगा । इसे 4° सेलसियस की तापमान में 1 वर्ष तक रखा जा सकता है एवं एक बार प्रयोग करने पर अगले तीन वर्षों तक इस रोग के विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता बन जाती है । इसका दाम भी कम है इस टीके की पाश्र्व प्रतिक्रिया कम होती है, इसका प्रयोग गर्भावस्था के दौरान भी किया जा सकता है ।

7. मुखशोथ या कंटेजियस एकथाइमा (Orf or Contagious Ecthyma) :

 यह Goat Disease विषाणु जन्य छूत की बीमारी है । सामान्यत: यह रोग भेड़ तथा बकरी को होता है । तथापि, यह रोग पशु से मनुष्य के शरीर में भी फैल सकता है । प्रत्यक्ष रूप से अथवा भोजन, पशुशाला में प्रयोग होने वाले सामान, असबाबों के माध्यम से भी रोग फैलाने वाले विषाणु स्वस्थ बकरियों के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा 2-3 दिनों के अंदर ही लक्षण दिखाई पड़ता है ।

मुखशोथ रोग के लक्षण(Symptoms of Orf Goat Disease):

मुँह के कोने में तथा होठों के चारों तरफ घाव होना इस रोग के मुख्य लक्षण है । यह रोग बकरियों को किसी भी उम्र में हो सकता है । तथापि, शावकों को यह रोग अधिक होता है । सर्वप्रथम, इस Goat Disease से पीड़ित बकरियों के मुँह के कोने तथा होठों के चारों तरफ छोटे-छोटे लाल मसा निकलते हैं । बाद में इनमें पस भर जाता है । इनके फटने पर पस निकलता है एवं सूख जाते हैं । बाद में सूखी त्वचा झर जाती है । यह प्रकिया लगभग एक माह तक चलती है । सूखी पपड़ी झर जाने के बाद होठों पर या मुँह के कोने में कोई दाग नहीं रहता है । चूंकि इस रोग में मुँह के कोने में तथा होठों पर घाव निकलता है, इसलिए बकरी खा नहीं सकती और कमजोर हो जाती है । सामान्यतः इस रोग में मुँह पर घाव निकलता है, कभी-कभी यह शरीर के अन्य अंश में भी फैलता है, जैसे आंख, नर बकरों के स्क्रोटम तथा श्वसन तन्त्र में भी घाव निकल सकता है । इस Goat Disease अर्थात बिमारी में, एक साथ कई बकरियां बीमार पड़ती हैं तथापि, इस रोग में मृत्युदर बहुत कम है । मृत्युदर कम होने पर भी बकरियों की शारीरिक वृद्धि कम होने के कारण इस व्यवसाय में हानि होती है ।

मुखशोथ में क्या करना चाहिए:

 इस Goat Disease अर्थात बीमारी की विशेष कोई चिकित्सा नहीं है । तथापि, घाव पर जीवाणुनाशक मल्हम (जैसे हिमैक्स, सोरिन, उकाडिन आदि) लगाने से फायदा होता है । जिस बकरी को यह रोग होता है, उसे आने वाले 2-3 वर्षों में यह रोग पुनः नहीं होता है । जिस पशुशाला में रोग प्रारंभ हुआ है, उसमें पाली जा रही स्वस्थ बकरियों को यह प्रतिरोधक टीका लगाया जा सकता है । जिस पशुशाला में बार-बार यह रोग फैलता है, वहाँ टीका लगवाने की आवश्यकता है । बाजार में यह टीका उपलब्ध नहीं है । मुँह पर निकले घावों पर से सूखी पपड़ी (dried scales) को चूर्ण करके इस रोग का टीका तैयार किया जा सकता है । पपड़ियों की 1% सस्पेंशन तैयार करके उसे 50% ग्लिसरल सेलाइन में मिलाकर (1% suspension of dried scabs in 50% glycerol saline) टीका तैयार किया जाता है । इस टीके को बकरी की ऊरु के अंदर त्वचा पर खंरोच डालकर (scarification) प्रयोग किया जाता है । टीका लगाने के एक सप्ताह के अंदर टीका लगाने के स्थान पर लाल दाने निकलने पर यह धारणा की जा सकती है कि टीका ठीक प्रकार से लगाया गया है । इस प्रकार से टीका लगाने के तीन सप्ताह के बाद रोग प्रतिरोध की क्षमता बनती है एवं यह 2-3 वर्षों तक स्थायी रहती है, 6-8 सप्ताह के मेमनों को पहले इस प्रकार से टीका लगाया जाता है । अनुभवी पशुचिकित्सक की सहायता के बिना यह टीका तैयार करना तथा प्रयोग करना अनुचित है ।

8. गलघोंटू या हिमोरेजिक सेप्टीसेमिया (Haemorrhagic Septicaemia Goat Disease )

यह Goat Disease जीवाणु जन्य खतरनाक रोग है । सामान्यतः यह रोग गाय तथा भैसों को अधिक होता है तथापि बकरियां भी इस रोग से पीड़ित होती है । पास्तुरेल्ला मल्टीसिडा (Pasteurella muiltocida) नामक जीवाणु से यह रोग फैलता है ।

गलघोंटू रोग के लक्षणः

इस Goat Disease से पीड़ित पशु को तेज बुखार (1069-107° फेरनहाइट) होता है, पशु ऊंघने लगता है तथा मांसपेशी में कंपन होता है भोजन तथा जुगाली करना बंद कर देता है । जबड़े के नीचले हिस्से में सूजन हो जाता है, सांस नलिका में दबाव पड़ने के कारण सांस लेने तथा छोड़ने में परेशानी होती है । सूजन क्रमशः गले से छाती तक फैल जाता है । मुँह, आंख व नाक की श्लेष्मल झिल्ली या म्यूकस पर्दा लाल हो जाता है । तरल मल के साथ रक्त निर्गत हो सकता है । अधिकतर पीड़ित पशु की मृत्यु एक दिन में ही हो जाती है ।

गलघोंटू रोग में क्या करना चाहिए:

ज्यादातर पीड़ित पशु की चिकित्सा प्रारम्भ होने से पूर्व ही उसकी मृत्यु हो जाती है । इसलिए चिकित्सा तुरंत प्रांरभ करनी चाहिए । स्ट्रेप्टोमाइसिन, आक्सीटेट्रासाइक्लिन जैसी एन्टिबायोटिक दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है । वर्ष में एक बार प्रतिशोधक टीका लगाने से इस रोग को रोक पाना संभव हैं । पहला टीका लगाने की आयु 6 माह है । एच.एस. वैक्सीन ( H.S. Vaccine, IVRI) 2 मिलि प्रत्येक बकरी की त्वचा के नीचे इंजेक्शन के रूप में दी जा सकती है ।

8. लंगड़ा बुखार या ब्लैक क्र्वाटर (Black Quarter Goat Disease):

यह Goat Disease जीवाणु जन्य संक्रामक रोग है । क्लोसट्रिडियम सोवेई (Clostriditunt chau00ei) नामक जीवाणु से यह रोग फैलता है । सामान्यतः यह रोग गाय, भैंस को अधिक होता है तथापि, यह बकरियों को भी हो सकता है ।

लंगड़ा बुखार रोग के लक्षणः

इस Goat Disease से पीड़ित पशु को तेज बुखार (105° -107) फेरनहाइट) होता है । पशु भोजन तथा जुगाली करना बंद कर देता है । पीड़ित पशु लंगड़ाने लगता है, उसके देह में कंपन होता है तथा पीठ टेढा करके रखता है । शरीर की पेशीयुक्त हिस्सों में अर्थात् पैर के ऊपरी हिस्से छाती व कंधों में सूजन हो जाता है और उन स्थानों को दबाने से कचकच’ या ‘बजबज’ आवाज निकलती है । पीड़ित पशु की मृत्यु दो तीन दिनों के अंदर हो जाती है । कभी-कभी उक्त किसी भी लक्षण को दर्शाने से पूर्व पशु की मृत्यु हो जाती है ।

लंगड़ा बुखार में क्या करना चाहिए:

इस रोग की चिकित्सा तुरंत शुरू करनी चाहिए, क्योंकि रोग के लक्षण प्रकट होने के 2-3 दिनों के अंदर ही पशु की मृत्यु हो सकती है । बीमारी की प्रथमावस्था में पेनिसीलिन इंजेक्शन के प्रयोग से फायदा होता है । वर्ष में एकबार प्रतिशोधक टीका लगाने से इस रोग की रोकथाम संभव होती है । प्रथम टीका लगाने की आयु 6 माह है । मात्रा बी.क्यू. वैक्सीन (B.Q. Vaccine, IVRI) 2 मिलि प्रत्येक बकरी की त्वचा के नीचे इंजेक्शन काफी है । गलघोंटू और लंगड़ा बुखार का युग्मटीका बाजार में उपलब्ध है जिसके प्रयोग से एकसाथ दोनों रोग से बच पाना संभव है । इसके अतिरिक्त, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुँहपका रोग का भी टीका इकत्रित रूप में उपलब्ध है ।

9. तड़का या एन्थ्रक्स (Anthrax Goat Disease)

गाय, भैंस, भेड़ आदि प्राणियों की भांति बकरियां भी इस रोग से पीड़ित होती  हैं यह Goat Disease बेसीलस एन्थेसिस (Bacillius anthracis) नामक जीवाणु से यह रोग फैलता है ।

एन्थ्रक्स रोग के लक्षणः

इस Goat Disease अर्थात रोग से पीड़ित बकरी बिना किसी लक्षण दर्शाए ही अचानक मर सकती है । पीडित बकरी के एक-दो दिन जिन्दा रहने की स्थिति में रोग के निम्नलिखित लक्षण प्रकट होते है । बकरी को तेज बुखार (104-105° फेरनहाइट) होता है, भोजन तथा जुगाली करना बन्द कर देती है पैरों तथा शरीर में कम्पन होता है तरल मल के साथ रक्त निर्गत होता है । सांस लेने तथा छोड़ने में परेशानी होती है  गला तथा पेट के नीचले हिस्से में सूजन होती है । क्रमश: शरीर में ऐंठन तथा तदुपंरात प्राणी की मृत्यु हो जाती है ।

एन्थ्रक्स में क्या करना चाहिए:

इस Goat Disease में पेनिसिलिन इंजेक्शन लगाने से फायदा होता है । अन्य जीवाणु नाशक दवाएं जैसे- ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, एम्पीसिलिन व क्लोक्सासिलिन आदि निर्धारित मात्रा में दी जा सकती है । नियमित टीका लगाने से इस रोग से बकरियों को बचा पाना संभव है । एन्थ्रेक्स स्पोर वैक्सीन (Anthrax spore vaccine) 1 मिली. प्रत्येक बकरी को त्वचा के नीचे इंजेक्शन, वर्ष में एक बार दिया जा सकता है ।

10. कॉक्सीडियोसिस (Coccidiosis Goat Disease)

यह Goat Disease प्रोटोजोआ जन्य रोग है  । मुर्गियों के फार्म में यह रोग अधिक होने पर भी बकरियों को भी यह रोग हो सकता है ।

कॉक्सीडियोसिस रोग के लक्षणः

इस Goat Disease अर्थात रोग से पीड़ित बकरियों को दस्त या अतिसार होता है । तरल मल के साथ रक्त भी निकल सकता है । शावकों में यह रोग अधिक होता है । बकरियों के तरल मल को सूक्ष्मदर्शी यंत्र के द्वारा जांच करने पर कॉक्सीडियोसिस रोग के बारे में पता चलता है ।

कॉक्सीडियोसिस में क्या करना चाहिए:

नम वातावरण में कॉक्सीडियोसिस रोग का संक्रमण अधिक होता है । इसलिए बकरियों के आवास (पशुशाला) को साफ सुथरा व सूखा, रखना चाहिए । दवा के ठीक प्रयोग से यह रोग ठीक हो सकता है । काक्सीडियोसिस रोग प्रतिरोधक दवा: डायाडिन टैबलेट (Diadin) 1 ग्राम 5 कि.ग्रा. दैहिक वजन के हिसाब से या सल्फामेथाजिन टैबलेट (5 ग्राम) प्रत्येक बकरी को एक टैबलेट दोनों दवाओं में पहले दिन के बाद मात्रा आधा कर देने से 3-4 दिनों के अंदर फायदा होगा ।

11. बकरियों की जूं

कई बार बकरियों के शरीर पर जूं निकल आते हैं । शरीर के बाल (रेशों) का चमक चला जाता है । बाल रूक्ष हो जाते है । जूं, किलनी या दूसरे कीड़े मकोड़े के आक्रमण से बकरियों के शरीर पर खुजली, दाद या खाज होता है । कई बार ये बाह्य परजीवी कीड़े विभिन्न रोगसृष्ट करने वाले जीवाणु के वाहक (Carrier) का कार्य करते है ।

जूँ पड़ने पर क्या करें :

 बकरियों के आवास (पशुशाला) को साफ सुथरा तथा बाह्य परजीवी से मुक्त रखना होगा । बकरियों के जू को भगाने के लिए दवा मिलाए हुए घोल में बकरियों को डुबोना होगा. या दवायुक्त चूर्ण (पाउडर) उसके शरीर पर मलना होगा । जैसे पेस्टोबैन (Pestoban) 1:10 अनुपात में पानी के साथ मिलाकर या बुटक्स (Butox) 2 मिलि दवा प्रति एक लीटर पानी में घोलकर बकरी के शरीर पर छिड़कने (स्प्रे) से फायदा होता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी कीड़े मारनेवाली दवाएं प्राणियों को हानि भी पहुँचाती है । इसलिए बकरियों के मुँह को बांधकर या मुँह पर जाली लगाकर यह दवा प्रयोग की जाती है । दवा प्रयोग करने के दो तीन दिन बाद पुनः प्रयोग की जा सकती है ।

12. आफरा या टिम्पैनी (Tympani or Bloat Goat Deases):

अपच के कारण पेट के अंदर गैस भर जाने से यह रोग होता है ।

आफरा रोग के लक्षणः

इस Goat Disease में अचानक पेट में भयानक रूप से सूजन हो जाता है । बकरी भोजन तथा जुगाली करना बंद कर देती है । कब्ज के साथ-साथ, कभी-कभी मल-मूत्र बंद हो जाता है । कभी-कभार पानी के जैसे तरल मल भी हो सकता है । इस रोग में बकरी मिमियाती है और सांस रूक जाने से उसकी मृत्यु हो जाती है । माँडी जैसे खाना, धान या चावल, दानेदार भोजन, आटा, चाशनी आदि अधिक मात्रा में खा लेने से यह बीमारी हो सकती है ।

आफरा में क्या करना चाहिए:

उचित चिकित्सा से यह रोग ठीक हो सकता है । विटामिन बी , (Vitamin B,) इंजेक्शन लगाने से कार्बोहाइड्रेट चयापचय ठीक तरह से होता है । प्रत्येक पीडित बकरी को 8 ग्राम मैग्नेशियम कार्बोनेट (Magnesium carbonate) या मैग्नेशियम टाईसिलिकेट (Magnesium trisilicate) जैसी एन्टासिड (Antacid ) पिलाया जा सकता है । विष्ठा बंद हो जाने पर 20 मिलि मिल्क ऑफ मैग्नेशियम (Milk of Magnesia) पिलाने से फायदा होता है । पेट में गैस भर जाने पर बकरी को तकलीफ होती है, पेट में छेद करके गैस निकाल देना होगा । इसके लिए ‘ट्रकर व कैनूला’, का प्रयोग किया जाता है आवश्यकता पड़ने पर नॉर्मल सैलाइन (Normal saline) के साथ सोडियम बाइकार्बोनेट (Sodium bicarbonate 7.5%) मिलाकर नस में (15 मिलि) इंजेक्शन लगाना होगा । जरूरत पड़ने पर ऑक्सीटेट्रासाइक्लीन इंजेक्शन (5 मिलि) रूमेन के अंदर एवं एविल इंजेक्शन (5 मिलि) मांसपेशी में लगाना होगा। पशुचिकित्सक के परामर्शानुसार यह कार्य करना चाहिए ।

13. बकरियों का कृमिरोग (Goat Disease Worm infestation) :

बकरियों को विभिन्न प्रकार की कृमि आक्रमण करती है । जैसे- गोलकृमि, टेषवर्म एवं फ्लूक ।कृमियां सामान्यत: पेट के अंदर व क्षुद्रान्त में रहती हैं तथा प्राणी द्वारा खाए गए संपूर्ण भोजन का सारतत्व खा लेती है । बकरी खाद्याभाव से क्रमशः कमजोर हो जाती है, इस Goat Diseaseमें  खून की कमी नजर आती है । कृमि के संक्रमण से शारीरिक वृद्धि कम होती है और दूध उत्पादन में भी कमी आती है ।

कृमिरोग के लक्षणः

कृमि से फैलने वाली बीमारी की प्रथमावस्था में कोई लक्षण नजर नहीं आते है । परंतु सूक्ष्मदर्शी यंत्र के द्वारा मल की जांच करने पर कृमि के अंडे नजर आते हैं । कई दिनों तक कृमि के संक्रमण से पीड़ित रहने पर इसके लक्षण प्रकट होते है तथा बकरी की मृत्यु भी हो सकती है । इस Goat Disease से पीड़ित बकरी की खाने-पीने की इच्छा रहने के बावजूद उसका शरीर कमजोर हो जाता है । बकरी तरल मल त्यागती है । कभी-कभी यह गाय के गोबर जैसे भी होता है । पेट लटक जाता है, उसकी चमक कम हो जाती है, त्वचा रूक्ष हो जाती है, कभी-कभी बाल भी झड़ जाते है ।

कृमिरोग में क्या करना चाहिए:

 अधिकांश कृमि बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दिखाई नहीं पड़ते हैं । परंतु उस यंत्र के द्वारा मल की जांच करके कृमि के अंडे की शिनाख्त करने के माध्यम से कृमि के संक्रमण के बारे में पता चलता है । किस प्रकार की कृमि से बीमारी हुई है, इसके बारे में पता करके निर्धारित मात्रानुसार कृमिनाशक दवा खिलानी होगी इसके अलावा, 3 महीनों के अंतराल में नियमित रूप से यह दवा खिलाने से इसका प्रतिरोध कुछ हद तक संभव है । इस Goat Disease  में कृमिनाशक दवा सामान्यतः सवेरे खाली पेट में खिलायी जाती है । इस दवा के साथ विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स (Vitamin B-Complex) जैसी दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है । गर्भवती बकरियों को कृमिनाशक दवा खिलाने से पहले  पशुचिकित्सक से परामर्श कर लेना चाहिए, अन्यथा गर्भवस्था में ऐसी दवाओं का प्रयोग अनुचित है । कारण गर्भावस्था के दौरान सब कृमि नाशक दवाएं खिलाने से गर्भपात की आशंका रहती है ।

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